गुरु गोरखनाथ महाकाली का युद्ध रहस्य
गुरु गोरखनाथ महाकाली दोस्तों महाकाली के रौद्र रूप से हर कोई वाकिफ है जो भी दानव आशापुरा कम करता है वह माता काली के प्रकोप से बच नहीं पता माता अपने क्रोध अग्नि से उसे दोस्त को भस्म कर देती है लेकिन क्या आपको पता है कि एक बार गुरु गोरखनाथ ने महाकाली को कैद कर लिया था अब उन्होंने ऐसा क्यों किया आइये जानते है। दोस्तों बाबा गोरखनाथ एक महान योगी थे। उनकी साधना और शक्ति के बारे में कई कहानियाँ प्रचलित हैं। एक ऐसी कहानी है जिसमें उन्होंने माँ काली को अपने पेट में कैद कर लिया था। हम आपको एक कथा के माध्यम से बताते हैं एक बार की बात है
श्री गोरखनाथ एक मार्ग से गुजर रहे थे तभी वहां अचानक महाकाली प्रकट हो गई और बड़े ही क्रोध स्वर में बोली तो इस मार्ग पर कैसे आ गया देवी मां काली को देखते ही गुरु गोरखनाथ ने उन्हें तुरंत प्रणाम किया और कहा जय हो देवी मां काली की माता क्या हुआ आप इतना क्रोधित क्यों है मुझे कोई गलती हो गई क्या तब माता काली रहती है कि है मूर्ख योगी तुझे इतना नहीं पता मेरे क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद मुझे प्रसन्न करने के लिए तुझे किसी न किसी जानवर की बलि देनी होगी तभी तो इस मार्ग में आगे जा सकता है
देवी काली की यह बातें सुनकर श्री गोरखनाथ को बहुत दुख हुआ
देवी काली की यह बातें सुनकर श्री गोरखनाथ को बहुत दुख हुआ और उन्हें क्रोध भी आया इसके बाद उन्होंने माता से कहा कि मैं ऐसा योगी नहीं जो किसी मासूम जानवर की बाली आपको पेट में चढ़ाव इसलिए मैं ऐसा काम बिल्कुल नहीं करूंगा गोरखनाथ की बातें सुनकर माता काली का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया और
वह आग बबूला हो गई इसके बाद उन्होंने कहा कि मैं ऐसी देवी हूं जिसका क्रोध कोई शांत नहीं करवा सकता चाहे वह कोई भी देवता या भगवान ही क्यों ना हो मैं रक्त बीज कुंभ व निकुंभ को मौत के घाट उतारा है मैं बड़े-बड़े दनाओ को और असुरों का संघार किया है इसलिए अब तुझे भी मेरे क्रोध से कोई नहीं बचा सकता
माता काली की बातें सुनकर श्री गोरखनाथ का क्रोध और भी बढ़
ही साधारण से साधु अब तेरा अंत निश्चित है मूर्ख माता काली की बातें सुनकर श्री गोरखनाथ का क्रोध और भी बढ़ गया उन्होंने कहा कि माता आप अपनी शक्तियों पर यूं अभिमान ना करें इसके कुछ देर बाद ही देवी महाकाली ने अपना विकराल रूप ले लिया और गोरखनाथ ने भी अपनी दिव्य शक्तियों का उपयोग शुरू किया
फिर दोनों में भीषण युद्ध कायम हो गया माता काली और श्री गोरखनाथ एक से बढ़कर एक दिव्यास्त्रों का एक दूसरे पर प्रयोग कर रहे थे यह भयानक युद्ध रुकने का नाम नहीं ले रहा था दोनों बहुत ही शक्तिशाली और युद्ध कौशल में परमगत थे कोई किसी से काम नहीं था यह युद्ध निरंतर चलता ही जा रहा थाढ़े
युद्ध निरंतर चलता ही जा रहा था
कुछ समय बाद महाकाली ने अपना विशालकाय रूप ले लिया और गोरखनाथ पर प्रहार शुरू कर दिया लेकिन गोरखनाथ ने भी प्राप्त अपनी शक्तियों से अपना रूप विशाल के कर लिया इसके बाद माता काली समझ रही थी कि गोरखनाथ को आम साधु संत नहीं है वह पुनः अपने वास्तविक रूप में आ गई और उन्होंने एक नभक्षण मक्खी का रूप ले लिया और
देखते ही देखते गुरु गोरखनाथ के शरीर के भीतर प्रवेश कर लिया फिर देवी काली ने धीरे-धीरे उनके कलेजे को खाना शुरू कर दिया जिसकी पीड़ा असहनीय थी गोरखनाथ को इससे बहुत दर्द हो रहा था और वह पीड़ा नहीं झेल पा रहे थे
यह सब देखकर देवी काली बहुत प्रसन्न हो रही थी उन्होंने कहा अब समझा तू मेरी ताकत को मेरे आगे सब छोटे हैं फिर तू तो एक तुछ्या शक्तियां प्राप्त कर लेने वाला साधु संत है तेरे शिष्य तुझ पर भये खाते होंगे लेकिन ही मुर्ख मैं उनमें से नहीं हूं मेरे क्रोध को शांत करने के लिए स्वयं शिव शंभू को आना पड़ता है। मेरे क्रोध की अग्नि में हर जीव जल जाता है इधर गोरखनाथ की पीड़ा पड़ती ही जा रही थी तभी उन्होंने
बाबा गोरखनाथ ने भगवान शंकर की स्तुति करना शुरू कर दिया
था तथा धीरे-धीरे अपने भीतर अग्नि जलने लगे वह सजनी के प्रकोप से माता काली का शरीर जलने लगा उसकी लपटे देवी के अभियान को चकनाचूर करने लगी जिस पर माता काली अपनी क्षमता की गुहार लगाने लगी उन्होंने श्री गोरखनाथ से माफी मांगी और कहने लगी है। महान विद्वान गोरखनाथ मुझे माफ कर दो तुम्हारे भीतर शंकर जी जैसा तेज है तुम्हारे तेज की अग्नि से मुझे अत्यंत पीड़ा हो रही है
जिसे मैं सह नहीं पा रही हूं मुझे अपनी भूल स्वीकार है। माफ कर दो। महान सिद्ध पुरुष देवी काली की बातें सुनकर गोरखनाथ का दिल पासिच गया और उन्होंने माता से कहा देवी मैं आपको छोड़ दूंगा लेकिन आपको मेरी तीन शर्ते मानना होगा
माता काली ने कहा है सिद्ध पुरुष मुझे आपकी सारी बातें स्वीकार है
वह कौन सी बाते है आइये जानते है दोस्तों आप जो कहेंगे मैं वह करूंगी मुझे केवल इस अग्नि चक्र से बाहर निकाल दीजिए जिस पर श्री गोरखनाथ ने कहा कि पहले की आप अपने भक्तों से किसी भी जानवर की बाली स्वीकार नहीं करेगी वह सच्चे मन से आपको जो भी चढ़ाएंगे आप उन्हें स्वीकार करेगी
दूसरा आप अपने भक्तों में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करेगी आपके लिए सब एक सामान्य ही होंगे
तीसरी और आखिरी सर्त की आप कभी भी किसी साधु या संत का अनादर नहीं करेंगे उन्हें हमेशा सम्मान की दृष्टि से ही देखेंगे क्योंकि उन्होंने कठोर तपस्या वह सांसारिक जीवन का त्याग करके सिद्ध शक्तियों को प्राप्त किया है गोरखनाथ की सारी बातें सुनकर देवी काली ने कहा मैं आपकी सारी शर्तें मानती हूं फिर गुरु गोरखनाथ उन्हें क्षमा कर देते हैं और माता उनके शरीर से बाहर आ जाती है। इसी प्रकार गुरु गोरखनाथ महाकाली का युद्ध रुका।
महाकाली को अपनी शक्ति का हुआ एहसास
बाहर आने के बाद वह कहती है मुझे अपनी शक्ति पर घमंड था जो आज टूट गया मैं यह समझ चुकी हूं कि इस संसार में कोई भी बड़ा नहीं है उसके ऊपर कोई ना कोई जरूर है। आप जैसे सिद्ध पुरुष का मैं अपमान किया मुझे भूल हो गई मैंने आपको कमजोर समझा था यह मेरी सबसे बड़ी गलती थी मुझे माफ कर दीजिए जिसके बाद गोरखनाथ ने उन्हें माफ कर दिया और प्रणाम कर अपने शिष्यों के साथ वहां से प्रस्थान किया
